नागालैंड के तमंचे से पूर्णिया में डिस्को :पूर्णिया
क्या हथियार अपनी अात्मरक्षा के लिए होता है या रुतबा अाैर रौब जमाने या डराने के लिए । ये इसलिए सवाल उठा है क्याेंकि पूर्णिया में ही अाम अादमी काे बंदूक का लाइसेंस बनवाने में पसीने छूट जाते हैं लेकिन धनबलियों और बाहुबलियों को चुटकी बजाते ही हथियार के लाइसेंस मिल जाते हैं।
लाइसेंस मिलते ही बाहुबली का तमगा लग जाता है, फिर इसके आर में अवैध काम भी अंजाम दिए जाने लगता है। जिले में कई ऐसे लोग है जो अपनी गाड़ी में खिड़की से बाहर बंदूक का नाल निकालकर चलने का फैशन बना लिया है। कही भी जाने पर अपने आस पास दो दो राइफलधारी जरूर रखते है। जबकि बंदूक रखने का उनके पास कोई मतलब ही नहीं है।
पूर्णिया में जहाँ हथियार का लाइसेंस बनाने में पसीने छूट जाते है वही नागालेंड में यह आसानी से बन जाता है। पूर्णिया सहित सीमांचल में कई ऐसे रैकेट काम कर रहे है जो फर्जी पते पर नागालेंड से हथियार का लाइसेंस आसानी से बनवा देते है लाइसेंस बनने के बाद पूर्णिया जिलाधिकारी के यहाँ भी उसका निबंधन कराना होता है। मगर बिना निबंधन के और बिना औचित्य के नागालेंड के तमंचे पर पूर्णिया में डिस्को हो रहा है।
कैसे बनता है लाइसेंस
नागालैंड लाइसेंसिंग विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से लाइसेंस बनाए गए थे। जिस व्यक्ति का लाइसेंस बनवाना है। उस व्यक्ति की ओर से एक हलफनामा तैयार किया जाता है कि वह आजकल नागालैंड के फलां पते पर रह कर काम कर रहा है। गांव के सरपंच से उसका वहां का निवासी होने का प्रमाण पत्र बनवा लिया जाता है। इसके आधार पर संबंधित अफसर से वहां का पता/पहचान संबंधी दस्तावेज बनवा लिया जाता है। इसके बाद लाइसेंसिंग विभाग के अधिकारी की मिलीभगत से किसी भी पुराने लाइसेंस धारी का ब्यौरा देकर रिटेनर के लिए उस व्यक्ति के नाम से आवेदन किया जाता ।
उसके आधार पर उस व्यक्ति के नाम से लाइसेंस की नई कापी बना दी जाती है। इस कापी पर रिटेनर शब्द भी नहीं लिखा जाता और जिस असली लाइसेंस धारक के ब्यौरे के आधार पर यह बनाया गया उसका ज़िक्र भी प्रमुखता से नहीं किया जाता। जिसका ब्यौरा इस्तेमाल किया जाता है उस लाइसेंस धारक को यह पता ही नहीं चलता कि उसके लाइसेंस के आधार पर किसी को उसका रिटेनर भी बनाया जा चुका है।
via सिटीहलचल-मोहित
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